आरक्षण, एक बीमारी या एक ईलाज !
आरक्षण, एक बीमारी या एक ईलाज. बीमारी उनके लिये जो इसकी
वजह से खुद को साबीत करने मे सक्षम नही हो पा रहे है और ईलाज उनके लिये जो इसकी
वजह से खूद की बिमार काया को बडी जल्दी से स्वस्थ कर पा रहे हैं. कुल मिलाकर कहे
तो कुछ समूदाय के लिय ये(आरक्षण) एक ऐसे सावन की तरह है जिसमे वे हमेशा भींगना
चाहते हैं और उनकी चाह ये भी है कि ये बरसात कभी खत्म ना हो बल्कि और बढे और इसकी
बरसात में उनके आने वाले सारे वंश साराबोर हो. पर उनके दर्द को कौन समझ पा रहा है
जो इसकी मार झेल रहे है, शायद कोई नही या शायद वे जो खुद इस दर्द से
पीडीत हैं. एक तरफ जहाँ आरक्षण हैं वहाँ वे सिर्फ उतनी हि मेहनत करते है जीतने से
वे उस आरक्षीत श्रेणी में आ सके और ठिक उसी चीज के लिये उन लोगो मे से बहूतो के
मेहनत का कोई कोई फल नही निकल पाता जो इस अमृत रुपी आरक्षण से वंचीत है जबकी अगर
कमपेरीजन किया जाय तो वे उस आरक्षीत श्रेणी में काफी ऊपर आ सकते हैं ! यहाँ उनके
दर्द को कोई समझ नही पा रहा है, और ये दर्द बहूत ही ज्यादा होता जा रहा
हैं और इसी दर्द से उबरने के लिये बेकहैं नतीते का इक उदाहरण है, हार्दिक पटेल का
आंदोलन. बेशक उस शख्स का आंदोलन बहूत समय से सह रहे समूदाय की आवाज हैं. जब ईश्वर
ने ईंशान को बनाया है, सब को दो ही हाथ और पैर दिये है तो फिर बिच मे
ये आरक्षण कहा से आ गया, और जिन्हे 50% आरक्षण मिला है वे और भी ज्यादा
की ख्वाहिश पाले बैठे हूये है और दबी जुबान से अपनी आवाज भी उठा रहे हैं. चलो इस
बात को मान लेते है की वे पिछ्डे हुये है पर ऐसे लोगो की भी संख्या बहूत है इस
श्रेणी मे आते नही है पर अगडे भी नही हैं. आरक्षण सही मायने मे उन्हे मिलना चाहिये
जो शारिरिक रुप से सक्षम नही है चाहे वो जिस भी श्रेणी मे आते हो. आज आंकडे उठा कर
देखे तो ऐसे कई सारे उदाहरण मिल जायेंगे जब ऐसी स्तीथी मे आत्महत्या तक की नौबत आ
जाती है.
एक बंदा दिन-रात मेहनत करके इसलीय पढता है कि उसे कम से कम 200 मे 150
मार्क्श आये तभी जाकर उसका चांस बन पायगा और ठिक उसी चिज के लिये दूसरा बंदा सोचता
है कि यार कम से कम 60-70 मार्क्श आ जाये तब तो साला नौकरी हो हि जायग. क्या ये
सही है?, मेरी नजर मे तो नही और कईयो की नजर मे नहीं.
सरकारी अस्पतालो मे अच्छी डिग्री वाले कम्पाउंडर है और कम डिग्री वाले डौक्टर. ठिक
ही तो है न, कि अच्छी पढाई पढने के बाद कईयोकी ख्वाहिश
विदेशो मे जाँब करने कि होती है. जब अपने देश मे उनके टैलेंट को एक संवैधानीक नियम
के तहत देखा जा रहा है तो वे क्यो रहे यँहा, और सरकार बात करती
है कि अपने देश को प्रगती के पथ पे ले जाना हैं.
सीधे अर्थो मे शीक्षा से आरक्षण खत्म ही कर देना चाहिय तब तो मालूम
चलेगा न की कौन कितना काबील है और जो भी काबील है वे ही पहुचेंगे सहि पदो पर हर
जगह और तब सहि मायने मे देश का विकाश होगा नहि तो दुसरा एक और काम भी हैं, आरक्षण........ सभी
को देदो या की सिर्फ जुमलो मे ही विस्वास करते हो
“हिंदु-मुस्लीम-शिक्ख-ईशाई, आपस मे सब भाई-भाई”........... . आरक्षण
सब को दो या इस बला को खत्म करो.
जय हिंद !
Comments
Post a Comment