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ख़ंजर

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ख़ंजर तुमने धार कहाँ से पाया है? क्या किसी की कला को तुमने शालीनता से चुराया है? या मोटी बुद्धि को घिस-घिस कर तुमने खुद ही धारदार बनाया है? क्या रुद्र रूप दिखलाकर तुमने मुसीबतों से किसी को बचाया है? या फिर किसी को गले लगा उसके पीठ में खुद को धँसाया है? चलो प्यास तुम्हें तो लगती होगी क्या जल से इसे बुझाया है? या बस रक्तपान से तृप्त हुए तुम और बस स्वाद इसी का पाया है? बोलों ख़ंजर.....! ✍️शशि रंजन #ख़ंजर

'द कश्मीर फाइल्स' सिनेमा

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'द कश्मीर फाइल्स' देखे सप्ताह भर से ज्यादा हो गए। समझ नहीं आ रहा कि क्या लिखूं? क्या बोलूं? स्तब्ध ! खामोश ! वेदना ! पीड़ा ! घृणा ! नफ़रत! फिर घृणा और नफ़रत किससे? किसी ख़ाश वर्ग से? हाँ, क्योंकि वे दोषी भी इसी वर्ग से थे। नहीं, क्योंकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश हैं।  अरे, भारत उस वक्त भी धर्मनिरपेक्ष ही था और धर्मनिरपेक्षता की चादर ओढ़े रखना किसी एक कि ही जिम्मेदारी नहीं है , सबकी है। (इस लेख में वैसे लिखने की इच्छा तो बहुत है पर फिर कभी और भाषा को मर्यादित करने की कोशिश जबरदस्ती की गई है वरना उन नपुसंक जिहादियों के लिए, हरा__, चु__या, कायर, जैसे शब्दों को मैं चुनना चाह रहा था।) पार्टियां एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोपण कर रहीं है। मेरी समझ से इस मुद्दे पर अबतक हर सरकार विफल रही है। बिट्टा कराटे जैसे लोग जब खुलेआम स्वीकार कर लेते है कि उन्होंने क्या किया है तो उसे तो कब तक का ठोक दिया जाना चाहिए था। अपराधियों की गाड़ियां तो पलटती रहती है न ! और वो तो आतंकवादी था, था क्या है।