“हर अफजल गोली खायगा, जब जब वो सर उठायगा !”

jnu campus की हालिया ताजा गतिविधिया क्या इसी बात का संकेत देती है कि स्वतंत्रता का मतलब यही है कि हम देश के ही खिलाफ हो जाये, उसे तोडने की बात करने लगेविद्रोही नारे लगाने लगे। एक बढिया शिक्षा, बढिया शिक्षक और बढिया शैक्षणिक माहौल से नई विचारधारा का जन्म होता है, लेकिम ये कैसी विचारधारा हैं जो एक ऐसा माहुल बनाने में लगी हैं जहां हाशिल कुछ नहीं होने वाला और हाशिल हुआ भी तो वो एक अंधकार के अलावा कुछ भी नहीं होगा। अफजल जैसो को शहीद बताना किस तरह की मानसिकता से परिचय कराती है..........क्या ये मीडिया के कैमरो के चमक धमक के सामने आने की बेताबी है या बेवजह माहौल खराब करने की। अफजल की बात करे तो संसद हमले मे शहिद को क्यो भुल रहे है वे........क्या उनके नाम तक पता हैं उनको, उनका क्या हुआ, उनके परिजन किस हाल मे हैं आज.....
क्या वे आतंकि थे अगर अफजल शहिद है तो?

संसद पर हमले के दौरान शहीद दिल्ली पुलिस के असिस्टेंट सब−इंस्पेक्टर नानक चंद का परिवार क्या सोच रहा होगा कि नानक कि कुर्बानी मजाक बन गई। शहीद हेड कॉन्सटेबल चौधरी विजेंद्र सिंह के परिजनों की आँखों मे हालीया स्तिथि देख आँसू जरुर होंगे। शहीद चौधरी विजेंद्र सिंह ,पूर्व उप राष्ट्रपति कृष्णकांत के ड्राइवर थे। शहीद कॉन्स्टेबल घनश्याम के परिजनों का दर्द कौन समझेगा ? कौन चिल्लायेगा उनकी आवाज बनकर?
दस साल पहले संसद पर हमले में शहीद, कमलेश कुमारी के खून पर लाल फीताशाही का रंग गाढ़ा साबित हो रहा है। उनके शहर में लगी उनकी आदमकद मूर्ति आज भी छतरी का इंतजार कर रही है और शहीदों की कुर्बानी पर गर्व करने वालों को मुंह चिढ़ा रहा है। किसने उठाई इसके खिलाफ आवाज?

शहीद ओमप्रकाश डबास (दिल्ली पुलिस में सहायक उप निरीक्षक) की मां ने आंखों में आँसू लिए एक पत्रकार से पूछा था कि बेटा तू आया हैं हमारे हालचाल जानने या उस गद्दार अफजल की चर्चा करने? सभी दूर उसी की चर्चा है। हमारे लाल मर जाते हैं और ये नेता लोग गद्दारों को छोड़ देते हैं। यही कहानी अन्य सभी शहीदों के परिजनों की है।

ये थे वो नौ शहीद : 1.शहीद जे.पी. यादव, 2.घनश्याम, 3.ओम प्रकाश, 4.नानक चंद, 5.राम पाल, 6.बिजेंद्र सिंह, 7.कमलेश कुमारी, 8.देशराज और 9.मताबर सिंह

बेवजह हंगामो मे फुदकने वालो से मेरा ये सवाल है कि वे असल मे खिलाफ किसके है, देश के या देस
शद्रोही के। लम्बे चौडे बकईती बाले तर्क देने से वे क्या खुद को गौरंवीत महशुस करते है। हाथो मे बोर्ड लिये ये नारा,
“अफजल हम शर्मींदा हैं, तेरे कातील जींदा हैं !”
बुलंद करने वालो से मै भी एक बात कहना चाहूँगा,
“हर अफजल गोली खायगा, जब जब वो सर उठायगा !”
  उन हँगामेबाजों को देष मे और कुछ मुद्दा नजर नहीं आता, खुद में देष के भविष्य को संवारने वालो का सपना देखने वालो को ये बेवकुफी करने की फुरसत मिलती कैसे हैं?
उनको ये सोचना चाहिए की देश बिखर जाएगा अगर उनके इस हरकत ने अपना पांव और पसार लिया तो, और पडोसी तो यही चाहता हैं, यँहा तक कि वो इस चिंगारी पर घी छिड़कने का काम शुरु भी कर चुका होगा...शायद। तो क्यो न हम इस देश मे एक ऐसे मुद्दे पर आपस मे लडते रहे जिससे सारी दुनिया मे हमारी पहचान धूमिल हो जाए।
और अगर फिर भी वे नही मानते है तो सरकार तमासा क्या कर रही है....सख्ती से पेशआये वो। देश्द्रोहीयो को सबक सिखाए, क्योकि आपका देशविरोधी हरकतो में कुछ देर के लिये शामिल होना आपकी भूल हो सकती है.......पर आर बार शामिल होते रहना अपराध हैं और आपके साथ भी वही होना चाहिए जो अफजल जैसो के साथ हुआ.....तो शर्मींदगी महशूस करे आप अपने आप पे...माफी मांगे इस देश से और बनाए न हंगामो में अपनी  जगह ,लेकिन मुद्दा देश के हित मे हो तो कौन करे न खिलाफत सरकार की, करे आलोचना, ये तो खूबसूरती हैं लोकतंत्र की।
अफजल जन्मजात आतंकी नहीं था, कोई नहीं होता.....लेकिन उसने जब आतंक का रास्ता चुना वो तब से ही देशद्रोही साबित हो गया। उसे आदर्श बना के क्या हासिल हो जाएगा.......आतंकियो की टोली। सोचिए ,और सोचिए, आपको सोचना पडेगा कि आपके साथ जो भीड खडी है वो सामने खडे सच्चे देशभक्तो की टोली के सामने तो आप कुछ भी नहीं है....अगर ये अहशास ना हैं आपको तो हो जायगा और आपको घर भी नसीब नहीं होगा देश तो छोड़िए......

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