मैं मेरी इस राह पे !



मैं मेरी इस राह पे, संग अकेला राही हूँ.
खूद की जंग-ए-महफील मे, लड रहा सिपाही हूँ.
मंजिल मेरी खुशी मेरी, उसे पाना मेरी चाहत हैं. 
खुद के दु:ख और खुशी का, बस मैं ही हमराही हूँ.
                  दूर रौशनी रात अंधेरी, झलक मंजिल का देती हैं.
                  हौले-हौले कदम बढाये, सांसे उठती गिरती हैं.
                  चाहत बस उसे छूने की, मेरी हर सांसो का ये जोर हैं.
                  मैं अकेला मंजिल के पीछे, और बाद मे इसका गवाही हूँ.
एक अकेला दिया रौशनी, तले अंधेरे रहती है.
प्रकाशमान करो दुनिया, बस मूक हो के कहती है.
ठीक दिये की भांति मन में, अलख जगे ये शोर हैं.
राहो की मिट्टी अमर रहे, उन राहो का मैं राही हूँ.

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