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Showing posts from February, 2016

“हर अफजल गोली खायगा, जब जब वो सर उठायगा !”

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jnu campus की हालिया ताजा गतिविधिया क्या इसी बात का संकेत देती है कि स्वतंत्रता का मतलब यही है कि हम देश के ही खिलाफ हो जाये , उसे तोडने की बात करने लगे ,  विद्रोही नारे लगाने लगे। एक बढिया शिक्षा , बढिया शि क्षक और बढिया शैक्षणिक माहौल से नई विचारधारा का जन्म होता है , लेकिम ये कैसी विचारधारा हैं जो एक ऐसा माहुल बनाने में लगी हैं जहां हाशिल कुछ नहीं होने वाला और हाशिल हुआ भी तो वो एक अंधकार के अलावा कुछ भी नहीं होगा ।  अफजल जैसो को शहीद बताना किस तरह की मानसिकता से परिचय कराती है..........क्या ये मीडिया के कैमरो के चमक धमक के सामने आने की बेताबी है या बेवजह माहौल खराब करने की। अफजल की बात करे तो संसद हमले मे शहिद को क्यो भुल रहे है वे........क्या उनके नाम तक पता हैं उनको , उनका क्या हुआ , उनके परिजन किस हाल मे हैं आज..... क्या वे आतंकि थे अगर अफजल शहिद है तो? संसद पर हमले के दौरान शहीद दिल्ली पुलिस के असिस्टेंट सब−इंस्पेक्टर नानक चंद का परिवार क्या सोच रहा होगा कि नानक कि कुर्बानी मजाक बन गई। शहीद हेड कॉन्सटेबल चौधरी विजेंद्र सिंह के परिजनों की आँखों मे ह...

आरक्षण, एक बीमारी या एक ईलाज !

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आरक्षण , एक बीमारी या एक ईलाज. बीमारी उनके लिये जो इसकी वजह से खुद को साबीत करने मे सक्षम नही हो पा रहे है और ईलाज उनके लिये जो इसकी वजह से खूद की बिमार काया को बडी जल्दी से स्वस्थ कर पा रहे हैं. कुल मिलाकर कहे तो कुछ समूदाय के लिय ये(आरक्षण) एक ऐसे सावन की तरह है जिसमे वे हमेशा भींगना चाहते हैं और उनकी चाह ये भी है कि ये बरसात कभी खत्म ना हो बल्कि और बढे और इसकी बरसात में उनके आने वाले सारे वंश साराबोर हो. पर उनके दर्द को कौन समझ पा रहा है जो इसकी मार झेल रहे है , शायद कोई नही या शायद वे जो खुद इस दर्द से पीडीत हैं. एक तरफ जहाँ आरक्षण हैं वहाँ वे सिर्फ उतनी हि मेहनत करते है जीतने से वे उस आरक्षीत श्रेणी में आ सके और ठिक उसी चीज के लिये उन लोगो मे से बहूतो के मेहनत का कोई कोई फल नही निकल पाता जो इस अमृत रुपी आरक्षण से वंचीत है जबकी अगर कमपेरीजन किया जाय तो वे उस आरक्षीत श्रेणी में काफी ऊपर आ सकते हैं ! यहाँ उनके दर्द को कोई समझ नही पा रहा है , और ये दर्द बहूत ही ज्यादा होता जा रहा हैं और इसी दर्द से उबरने के लिये बेकहैं नतीते का इक उदाहरण है , हार्दिक पटेल का आंदोलन. बेशक उ...

ये कैसा मौसम है ?

आज लगभग पुरी दुनिया एक ऐसे Monsoon मे डूबी हूई है जिसमे वो हर पल , हर समय भीगती रहती है और ये Monsoon है Terrorism Monsoon. Terrorism Monsoon कहने का मतलब ये एक ऐसे मौसम की तरह है जो कभी आया था छोटे रुप मे , आज मौजुद है बडे रुप मे और शायद कल भी मौजुद रहेगा इससे भी बडे रुप मे. आमतौर पर तो हर मौसम की एक समय सीमा होती है जो आता है और चला जाता है पर ये अब तक गया नही है और अबतक इस विश्व के कई बडे भागो मे इसकी हवाये बह रही है जो अपने साथ कुछ भी उडाये ले जा रही है और छोड जा रही है एक ऐसा मलबा जिन्हे साफ करते करते कुछ खुद गंदे हो जाते है और उस मलबे पे एक ऐसी राजनीति शुरु होती है जो इस Monsoon की तरह खत्म नही होती और जब तक खत्म होती है तबतक दुसरे मलबे का ढेर खुद पे होने वाली राजनीति का इंतजार कर रहा होता है. एक असंतोष की भावना से उपजा ये Terrorism कुछ नही देखता . चलती Train उडती Plain और जमीन पे खडी Building , कौन इनके निशाने पे कब आ जाये कोई कुछ कह नही सकता . बेशक हमारी सरकार इनपे लगाम करती है पर लगाम फिर छुट जाता है और कोई नया बुरा परिणाम सामने मुंह बाये खडा होता है. इनका नेट...

मैं मेरी इस राह पे !

मैं मेरी इस राह पे , संग अकेला राही हूँ . खूद की जंग-ए-महफील मे , लड रहा सिपाही हूँ. मंजिल मेरी खुशी मेरी , उसे पाना मेरी चाहत हैं .   खुद के दु:ख और खुशी का , बस मैं ही हमराही हूँ.                   दूर रौशनी रात अंधेरी , झलक मंजिल का देती हैं.                   हौले-हौले कदम बढाये , सांसे उठती गिरती हैं.                   चाहत बस उसे छूने की , मेरी हर सांसो का ये जोर हैं.                   मैं अकेला मंजिल के पीछे , और बाद मे इसका गवाही हूँ. एक अकेला दिया रौशनी , तले अंधेरे रहती है. प्रकाशमान करो दुनिया , बस मूक हो के कहती है. ठीक दिये की भांति मन में , अलख जगे ये शोर हैं. राहो की मिट्टी अमर रहे , उन राहो का मैं...