Posts

छोटे शहरों में

छोटे शहरों में  अक्सर शांति बनी रहती है। तब तक के लिए जब तक बह रही हवाएं अचानक बहुत गर्म या बहुत ठंड न हो जाए। छोटे शहरों में मौन रहना आहार का एक मुख्य अंग साबित होता है जिसे बस पचा लिया जाता है हाँ बेशक, यह पाठ्यक्रम के  उन शीर्षकों की भांति है  जिनको पढ़ा नहीं जाता कभी छोटे शहरों में  एक जादू होता है कभी - कभी लोग अपनी छोटी सी जान को बहुत प्यार से रखते है अपने आप को कसकर बंद कर लेते है अपने छोटे से पाप के साथ छोटे शहरों में कभी-कभार अज्ञात वाहन गुजरते है और खम्बों पर जल रही पलीली रोशनियाँ  उच्च अवज्ञा में स्तब्ध हो जाती है अंधेरे को समेटे उजाला  निश्चित और खामोश हो जाता है

कुछ तो खतरे में है।

Image
सुबह बड़ी ही जल्दी नींद खुल गई है फलाने फलाने रंग वाले की। दिन के नौ बजे रहे होंगे शायद। एक कथित राष्ट्रपुरुष ने अपने दोनों हाथों को आपस मे रगड़ कर आंख पर मलने की बजाए एक अंगूठे को स्क्रीन पर हल्का सा सहलाया और प्राइवेसी की चौखट को लांघ कर सोशल मिडिया के कुंड में डुबकी लगाया। डुबकी लगाते ही अगल बगल में उसने कई सारी मछलियों और शार्क्स को पाया। सभी अपना अपना आहार लेते और डकार लगाते पाए गए। छोटी मछलियों ने अपने समझ के मुताबिक शार्क्स के रवैये को असवैंधानिक बताया तो शार्क्स ने हिंसा के विरोध में कई मिल लम्बा सफर तय कर लिया।  चिल्ला चिल्ला कर धीरे बोलने वालों ने देशभक्ति की नई परिभाषा तय की। कुछ टिकधारियो ने फैक्ट चेक के नाम पर कितनी ही सारी अनफैक्ट बातें प्रस्तुत कर दी और फिर किसी ग्रुप में चाय की चुस्की लेते हुए कहा, 'बड़ा ही भयावह माहौल है, देश खतरे में है' । सुबह की हैडलाइन पढ़ते ही एक सरकारी भवन से होते हुए एक बड़े न्यूज पेपर के बड़े से ऑफिस फिर वहाँ से एडिटर के छोटे से फोन पर एक फोन आया, 'कदम कदम बढ़ाए जा' वाले रिंगटोन के साथ ,  फोन रिसीव होते ही आवाज आई, 'हाई...

ख़ंजर

Image
ख़ंजर तुमने धार कहाँ से पाया है? क्या किसी की कला को तुमने शालीनता से चुराया है? या मोटी बुद्धि को घिस-घिस कर तुमने खुद ही धारदार बनाया है? क्या रुद्र रूप दिखलाकर तुमने मुसीबतों से किसी को बचाया है? या फिर किसी को गले लगा उसके पीठ में खुद को धँसाया है? चलो प्यास तुम्हें तो लगती होगी क्या जल से इसे बुझाया है? या बस रक्तपान से तृप्त हुए तुम और बस स्वाद इसी का पाया है? बोलों ख़ंजर.....! ✍️शशि रंजन #ख़ंजर

'द कश्मीर फाइल्स' सिनेमा

Image
'द कश्मीर फाइल्स' देखे सप्ताह भर से ज्यादा हो गए। समझ नहीं आ रहा कि क्या लिखूं? क्या बोलूं? स्तब्ध ! खामोश ! वेदना ! पीड़ा ! घृणा ! नफ़रत! फिर घृणा और नफ़रत किससे? किसी ख़ाश वर्ग से? हाँ, क्योंकि वे दोषी भी इसी वर्ग से थे। नहीं, क्योंकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश हैं।  अरे, भारत उस वक्त भी धर्मनिरपेक्ष ही था और धर्मनिरपेक्षता की चादर ओढ़े रखना किसी एक कि ही जिम्मेदारी नहीं है , सबकी है। (इस लेख में वैसे लिखने की इच्छा तो बहुत है पर फिर कभी और भाषा को मर्यादित करने की कोशिश जबरदस्ती की गई है वरना उन नपुसंक जिहादियों के लिए, हरा__, चु__या, कायर, जैसे शब्दों को मैं चुनना चाह रहा था।) पार्टियां एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोपण कर रहीं है। मेरी समझ से इस मुद्दे पर अबतक हर सरकार विफल रही है। बिट्टा कराटे जैसे लोग जब खुलेआम स्वीकार कर लेते है कि उन्होंने क्या किया है तो उसे तो कब तक का ठोक दिया जाना चाहिए था। अपराधियों की गाड़ियां तो पलटती रहती है न ! और वो तो आतंकवादी था, था क्या है।

1984 दंगा : 9 आधिकारिक जांचों के बावजूद लापता सच।

Image
HARTOSH SINGH BAL की रिपोर्ट 18 February 2019 के द   कारवां के पेज से 31 अक्टूबर 1984, बुधवार. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके दो सिख गार्डों ने हत्या कर दी. इसके बाद लगभग तीन दिनों तक दिल्ली में हुई हिंसा में 2733 सिख मारे गए. कानपुर, बोकारो, जबलपुर और राउरकेला सहित कई और भारतीय शहरों में भी सिखों पर हमला किया गया. ये स्वतंत्र भारत में सांप्रदायिक हिंसा के सबसे खूनी और क्रूर मामलों में से एक है. अगले दो दशकों में नौ जांच आयोग बनाए गए. इनमें सात ने त्रासदी के विशिष्ट पहलुओं की जांच की. जैसे मृतकों की संख्या, जिसे आधिकारिक तौर पर 1987 में आहूजा समिति द्वारा स्थापित किया गया था. दो पैनल- रंगनाथ मिश्रा आयोग, जिसका गठन 1985 में हुआ और जस्टिस जीटी नानावती आयोग, जिसकी अंतिम रिपोर्ट 2005 में प्रकाशित हुई थी, इसे संपूर्णता में हिंसा को देखना का जिम्मा सौंपा गया था. उन दो आयोगों की रिपोर्टों में अभी भी चौंकाने वाली बातें हैं, जिन्हें पढ़ा जाना चाहिए. दोनों ने कई पीड़ितों और गवाहों की गवाही और कुछ आरोपियों के बयान भी लिए. इनमें पुलिस अधिकारी भी शामिल थे, जो बुरी तरह प्रभावित ...

इरफान : एक यात्रा उनके अभिनय जीवन की

Image
       इरफान ने अपने नाम से अपना सरनेम ,खान जब हटाया तो उनसे पूछ गया ऐसा क्यों? तो उनका जवाब था, "मैं बोझ लेकर नहीं चलना चाहता" वो जितने अपनी अम्मी सईदा बेगम के इरफान थे उतने ही पूरे भारत के रहना चाहते थे, न रत्ती भर ज्यादा न रत्ती भर कम। चलते हैं इरफान के अभिनय के साथ एक यात्रा पर, इरफान एक युग "पुरूष" का नाम था जिनकी "दृष्टि" ही उनके "तलवार" की धार जैसे अभिनय की "आन" बान और शान थी। इरफान अपने चरित्र में इस कदर "डूब" जाते थे कि "राइट या रॉंग" वाली बातों का कोई हिस्सा मौजूद ही नहीं रहता था। वो बिल्कुल "मि. 100%" थे। इरफान खान का पूरा नाम साहबजादा इरफान अली खान था। इनका जन्म 7 जनवरी 1967 को राजस्थान के जयपुर में हुआ था। वालिद यासीन अली खान की "फुटपाथ" पर टायर की दुकान थी। इरफान क्रिकेट में "अपना आश्मां" बुलंद करना चाहते थे पर इसके लिए खुद से किए गए "वादे इरादे" पैसों की तंगी की वजह से "अधूरा" रह गया। "हिंदी मीडियम" वाले इरफ...

पुरानी यादें

Image
इंसान अपनी जिम्मेदारियां निभाते निभाते काफ़ी आगे निकल जाता हैं। बिता हुआ वक्त तो हर किसी के लिए मधुर स्मृति होता हैं पर ये निर्भर करता है इस बात पे कि कोई बीते हुए वक्त से ही आगे बढ़ जाता हैं और कोई बीते वक्त को भुला के नया वक्त बना जाता है......कुछ यही है इस कविता में मकड़ियों के जालो में, उलझ चुका था वो पुराना कमरा, जिनसे पुरानी यादें जुड़ी थी, आज सालो बाद, अनायास ही कदम पड़े, उस वीराने महफ़िल में, यादों की हर आवाजों से, गूँज उठा मन मेरा, हर परत की मोटाई बढ़ गई थी, धूल क़ी चादरो से, दीवारो पे उकेरी गई तस्वीरें, मुझे देख रही थी, धुन्धले बादलो से, देख टेबल पर पड़ी अलार्म की घड़ी, सहसा लगा अभी-अभी जग पाया हूँ, पर आँखो से मन को हुआ अहशास, इस महफ़िल मे बड़ी देर से आया हूँ, टेबल के ड्राल में,  उस पेन की निब रुकी थी वही, जहां छोडा था उसे मैंने, देख उस पेन को, अहशास हुआ उस दिन का, जब उससे रिस्ता तोड़ा था मैंने, अचानक कमरे की धूल उड़ने लगी, पागल पैरो की चहलकदमी से, ढूँढ रहा था कुछ खाश मैं, क़िताबो के पन्नो मे बड़ी बेचैनी से, वक्त लगा और आँखे ठिठक गई, दो पन्नो के बीच पड़े तस्वीर प...

कोरोना-थोड़ी बातें

Image
पूरी दुनिया में तबाही मचाते हुए इस वायरस ने इंसानों को भयभीत कर रखा हैं। इंसान अपनी हद में हैं। तो पढ़ते हैं इंसानों को उनके हद में लाने वाले इस वायरस के बारे में।  कोरोनावायरस कई प्रकार के विषाणुओं का एक ऐसा समूह है जो इंसानों और जानवरों में रोग उत्पन्न करता है। यह आरएनए वायरस होते हैं जो मानवों में श्वास तंत्र के द्वारा संक्रमण पैदा करता है जिसकी गहनता हल्की (जैसे सर्दी-जुकाम) से लेकर अति गम्भीर (जैसे, मृत्यु) तक हो सकती है। जानवरो जैसे गाय और सूअर में इनके कारण अतिसार हो सकता है जबकि इनके कारण मुर्गियों में ऊपरी श्वास तंत्र के रोग उत्पन्न हो सकते हैं। इसके रोकथाम के लिए कोई टीका (वैक्सीन) अभी तक उपलब्ध नहीं है और  इसका उपचार प्राणी के प्रतिरक्षा प्रणाली पर निर्भर करता है। अभी तक दिख रहे  रोगलक्षणों (जैसे कि निर्जलीकरण या डीहाइड्रेशन, ज्वर, आदि) का उपचार किया जा रहा है ताकि संक्रमण से लड़ते हुए शरीर की शक्ति बनी रहे। चीन के वूहान शहर से 2019 में उत्पन्न होने वाला नोवेल कोरोना वायरस इसी समूह के वायरसों का एक उदहारण है।  WHO ने इसका नाम COVID-19 रखा हैं। च...

हमने सुना था एक हैं भारत !

कोरोना, चैप्टर-2

Image
चैप्टर-2 【Reality】 जनवरी लास्ट, चीन में मौत का सिलसिला थम नही रहा हैं पर नाही चीनी सरकार इसे गंभीर ले नही रही हैं नाही दूसरे देशों को सतर्क कर रही हैं और नाही WHO को सही रिपोर्ट दे रही हैं। हालांकि चीन ने 31 दिसम्बर को ही WHO को कोरोना के बारे में अपडेट किया जरूर पर सीरियस तरिके से नहीं। अब कोरोना फैलना शुरू होता हैं बाहर के देशों में। इटली के रोम में पहला कन्फर्म केश मिलता है 31 जनवरी को जो चीनी कपल है और जो 28 जनवरी को मिलान एयरपोर्ट के रास्ते रोम पहुँचा हैं। अगली दोपहरी को उन्हें सर्दी खाँसी होती हैं फिर शाम को ये भर्ती होते हैं लज़्ज़ारो सपल्लनज़नी नेशनल इंस्टीट्यूट फ़ॉर इन्फेक्शस डीसीसेस में, जहाँ उनमे कोरोना की पुष्टि होती हैं 31 जनवरी को। सिर्फ उसी एक केश पर इटैलियन गवर्नमेंट नेशनल इमरजेंसी घोषित कर देती हैं छः महीनों के लिए। इधर चाईना के बाहर पहली मौत होती हैं फिलिपिंश में जो एक 44 वर्षीय चीनी नागरिक हैं और जो 12 जनवरी को हॉन्ग कॉन्ग से फिलिपिंश आया हुआ हैं। फरवरी छः को एक और इटैलियन नागरिक कोरोना पॉजिटिव पाया जाता है और 21 फ़रवरी को 16 कन्फर्म केश पाए जाते हैं तथा उसके अगले...

कोरोना, चैप्टर-1

Image
  चैप्टर 1 【Reality】 इसमें कोई शक नहीं कि अमेरिका महाशक्ति हैं और चीन आने वाले वक्त में ये पद हथियाना चाहता हैं तो उसकी नजर हमेशा 360 डिग्री घूमती रहती हैं। पश्चिमी देशों में क्रिसमस की छुट्टियां खत्म होने को हैं। पूरा वर्ल्ड नए वर्ष के आगमन की तैयारियों में जुटा हुआ हैं और इधर चीन के हुबेई प्रांत के बुहान शहर के एक हॉस्पिटल में पहला केश रजिस्टर होता हैं दिसंबर 31 को, पीड़ित इसे हल्के में लेता हैं, अगले कुछ दिनों में डॉक्टर्स इसे वायरल फीवर बताते है और नाम देते हैं, " कोरोना "।  चीन , वर्ल्ड की सबसे बड़ी आबादी वाला देश, एक कम्युनिस्ट देश, एक विकसित देश और अपनी संस्कृतियों का पालन करने वाला एक अनूठा देश। एक ऐसा देश जो विश्व शक्ति बने की चाहत रखता हैं और उसके लिए कुछ भी कर गुजरने की चाहत रखता हैं तो क्या कोरोना कुछ ऐसा ही कदम हैं ? वुहान के सी फ़ूड मार्केट से कई सारे मरीजो की संख्या बढ़ती जाती है। जनवरी 22 और 23 को मरीजो में रिकवरी भी होती हैं पर तबतक वायरस कोरोना अपने मोडरेट स्टेज से बाहर निकल चुका होता हैं और अगले दिन (24 जनवरी) से मौत का तांडव शुरू होता हैं। 2 फरवर...