कुछ तो खतरे में है।

सुबह बड़ी ही जल्दी नींद खुल गई है फलाने फलाने रंग वाले की। दिन के नौ बजे रहे होंगे शायद। एक कथित राष्ट्रपुरुष ने अपने दोनों हाथों को आपस मे रगड़ कर आंख पर मलने की बजाए एक अंगूठे को स्क्रीन पर हल्का सा सहलाया और प्राइवेसी की चौखट को लांघ कर सोशल मिडिया के कुंड में डुबकी लगाया। डुबकी लगाते ही अगल बगल में उसने कई सारी मछलियों और शार्क्स को पाया। सभी अपना अपना आहार लेते और डकार लगाते पाए गए। छोटी मछलियों ने अपने समझ के मुताबिक शार्क्स के रवैये को असवैंधानिक बताया तो शार्क्स ने हिंसा के विरोध में कई मिल लम्बा सफर तय कर लिया। 
चिल्ला चिल्ला कर धीरे बोलने वालों ने देशभक्ति की नई परिभाषा तय की। कुछ टिकधारियो ने फैक्ट चेक के नाम पर कितनी ही सारी अनफैक्ट बातें प्रस्तुत कर दी और फिर किसी ग्रुप में चाय की चुस्की लेते हुए कहा, 'बड़ा ही भयावह माहौल है, देश खतरे में है' ।

सुबह की हैडलाइन पढ़ते ही एक सरकारी भवन से होते हुए एक बड़े न्यूज पेपर के बड़े से ऑफिस फिर वहाँ से एडिटर के छोटे से फोन पर एक फोन आया, 'कदम कदम बढ़ाए जा' वाले रिंगटोन के साथ ,  फोन रिसीव होते ही आवाज आई, 'हाई कमान आपके काम से काफी खुश है, कल अपने कलम से कुछ ऐसा करिए कि छोटी मछलियों और शार्क्स दोनों को आहार के लिए कोई न कोई मुद्दा मिलता रहे।

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