ख़ंजर

ख़ंजर
तुमने धार कहाँ से पाया है?

क्या किसी की कला को
तुमने शालीनता से चुराया है?
या मोटी बुद्धि को घिस-घिस कर
तुमने खुद ही धारदार बनाया है?

क्या रुद्र रूप दिखलाकर तुमने
मुसीबतों से किसी को बचाया है?
या फिर किसी को गले लगा
उसके पीठ में खुद को धँसाया है?

चलो प्यास तुम्हें तो लगती होगी
क्या जल से इसे बुझाया है?
या बस रक्तपान से तृप्त हुए तुम
और बस स्वाद इसी का पाया है?

बोलों ख़ंजर.....!
✍️शशि रंजन
#ख़ंजर

Comments

Popular posts from this blog

मोहब्ब्ते-ए-जाम !

आरक्षण, एक बीमारी या एक ईलाज !

कोरोना, चैप्टर-1