इंसान अपनी जिम्मेदारियां निभाते निभाते काफ़ी आगे निकल जाता हैं। बिता हुआ वक्त तो हर किसी के लिए मधुर स्मृति होता हैं पर ये निर्भर करता है इस बात पे कि कोई बीते हुए वक्त से ही आगे बढ़ जाता हैं और कोई बीते वक्त को भुला के नया वक्त बना जाता है......कुछ यही है इस कविता में मकड़ियों के जालो में, उलझ चुका था वो पुराना कमरा, जिनसे पुरानी यादें जुड़ी थी, आज सालो बाद, अनायास ही कदम पड़े, उस वीराने महफ़िल में, यादों की हर आवाजों से, गूँज उठा मन मेरा, हर परत की मोटाई बढ़ गई थी, धूल क़ी चादरो से, दीवारो पे उकेरी गई तस्वीरें, मुझे देख रही थी, धुन्धले बादलो से, देख टेबल पर पड़ी अलार्म की घड़ी, सहसा लगा अभी-अभी जग पाया हूँ, पर आँखो से मन को हुआ अहशास, इस महफ़िल मे बड़ी देर से आया हूँ, टेबल के ड्राल में, उस पेन की निब रुकी थी वही, जहां छोडा था उसे मैंने, देख उस पेन को, अहशास हुआ उस दिन का, जब उससे रिस्ता तोड़ा था मैंने, अचानक कमरे की धूल उड़ने लगी, पागल पैरो की चहलकदमी से, ढूँढ रहा था कुछ खाश मैं, क़िताबो के पन्नो मे बड़ी बेचैनी से, वक्त लगा और आँखे ठिठक गई, दो पन्नो के बीच पड़े तस्वीर प...